पुस्तक की आत्मकथा हिंदी निबंध लेखन – Hindi Essay on Pustak ki Atmakatha

हमारा ये आर्टिकल पुस्तक की आत्मकथा के बारे में लिखा गया है। जीवन में पुस्तक का क्या महत्व है, पुस्तक का इतिहास क्या है ये सभी विषय इस आर्टिकल में बताये गए हैं। विधार्थियों के लिए पुस्तक की आत्मकथा एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय माना जाता है। तो चलिए शुरू करते हैं हमारा आज का लेख पुस्तक की आत्मकथा पर निबंध (Essay on Book in Hindi) और विस्तार से जानते हैं पुस्तक के बारे में।  

पुस्तक की आत्मकथा निबंध – Pustak Ki Atamkatha Essay in Hindi [1400 Words]

मैं पुस्तक हूं। मनुष्य मुझे पढ़कर ही विद्वान बनता है। वह मनुष्य जो मुझे सम्मान देता है, मेरा दोस्त बनता है, वह अपने समाज में सम्मान प्राप्त करता है। किसी भी मनुष्य को मेरा साथ एक सभ्य व्यक्ति बनाता है, तथा उचित अनुचित के प्रति इंसान भेद उत्पन्न कर पाता है। उम्र कोई भी हो मनुष्य की ज्ञान की शुरुआत पुस्तक से ही की जाती है। 

मुझे बस छोटे बच्चे ही नहीं बल्कि सभी वर्गों के लोग और सभी उम्र के लोग पढ़ते हैं। मैं समाज में ज्ञान बांटने का कार्य करती हूं। जिन व्यक्तियों का शौक होता है मुझे पढ़ना उनका मन शांत रहता है तथा वह समाज में सम्मान के पात्र रहते हैं। मैं अलग-अलग रूपों में दुकानों में उपलब्ध होती हूं। जिसमें कुछ प्रमुख हैं- काव्य संग्रह, उपन्यास, गद्य संग्रह इत्यादि। मुझे प्रत्येक व्यक्ति अपने शौक के अनुसार खरीदता है।

जिसे कविताएं पसंद हो वह कविताएं पढ़ने के लिए, इसे उपन्यास पसंद हुआ उपन्यास पढ़ने के लिए तथा विश्वविद्यालयों के बच्चे अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुझे खरीद लेते हैं। व्यक्ति जब छोटा होता है, उस समय उसे किताबों से नैतिक ज्ञान प्राप्त होता है। जिसमें हम कहानियों के रूप में बच्चों को नैतिक ज्ञान देने में सहायक होते हैं। उम्र में बड़े व्यक्तियों के लिए कई प्रमुख उपन्यास है जिन्हें व्यक्ति अपने शौक के लिए पढ़ता है।

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पुस्तक का इतिहास

प्राचीन काल से ही मेरा उपयोग ज्ञान को संग्रहित करने के लिए किया जाता रहा है। ज्ञान की प्रत्येक बातें मुझ में लिख दी जाती हैं।  मुझे संभाल कर रख दिया जाता है। इसका फायदा यह तब होता है जब व्यक्ति पढ़ी हुई चीजों को भूल जाता है।   

उसे पुनः अध्ययन करना पड़ता है। इस दौरान मेरी मदद से व्यक्ति पुनः वह ज्ञान प्राप्त कर लेता है। प्राचीन काल में मेरा निर्माण भोजपत्र  द्वारा होता था। भोजपत्र को सुख जाने के पश्चात ऋषि मुनियों द्वारा मुझ पर शब्द संग्रहित किए जाते थे तथा सभी भोज पत्र को मिलाकर मेरा निर्माण होता था। प्राचीन काल में मेरा अस्तित्व प्रकृति से ही शुरू हुआ । गुरुकुल में शिक्षार्थ गए छात्र मुझ पर लिखे ज्ञान का अध्ययन करते तथा प्रयोग करते थे।

वर्तमान समय में मेरी स्थिति

अब मेरा निर्माण कारखानों में होता है। मेरे पन्नों को बनाने के लिए कारखानों में कई प्रकार की मशीनें उपलब्ध है। सर्वप्रथम वह रद्दी व बांस  से मेरे पन्नों का निर्माण करते हैं। पन्नों को निर्मित करने के बाद मशीनों द्वारा ही मेरी छपाई की जाती है।

छपे हुए पन्नों को संग्रहित कर के मेरा निर्माण किया जाता है।  मुझे एक मोटी तथा सुसज्जित जिल्द पहनाई जाती है। जिससे मैं पूरी तरह तैयार होकर  दुकानदारों को सौंपी जाती हूं। दुकानों पर जाकर इंसान अपनी रूचि के अनुसार मुझे खरीदते हैं। कुछ इंसानों की रूचि कविताएं पढ़ने में होती है वह मुझे कविताएं पढ़ने के लिए खरीदते हैं। 

कुछ इंसानों की रूचि उपन्यास पढ़ने में होती है वह मुझे उपन्यास पढ़ने के लिए खरीदते हैं।  कुछ विद्यार्थी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के लिए अपने पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तक लेते  हैं।

मनुष्य की दुनिया में अब बहुत कम मनुष्य रह गए हैं जिनको मुझसे लगाव है। मनुष्य ने अपने बच्चों को मोबाइल से जोड़ दिया है। जिससे बच्चों के मस्तिष्क में मेरे प्रति दूरीयां उत्पन्न हो गयी है। अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए बच्चे मुझसे ज्यादा मोबाइल फोन में रुचि लेने लगे हैं। 

परंतु अभी भी कई छात्र हैं जो मुझे पढ़ते हैं तथा मेरा अध्ययन करते हैं और मुझे श्रेष्ठ समझते हैं उन्हें मैं एक दिन इस समाज का एक सम्मानित हिस्सा बना दूंगी। प्राचीन काल से ही ज्ञान के लिए प्रत्येक मनुष्य मेरा उपयोग करता है।  उसके अंधकारमय जीवन को प्रकाश में बदलने के लिए शिक्षकों द्वारा मेरा अध्ययन कराया जाता है। 

परंतु अब जब कोई व्यक्ति मुझे खरीद लेता है, तथा मेरा उपयोग बस अलमारियों में साज सज्जा के काम में लगा देता है यह मेरे लिए काफी दुखद स्थिति होती है । कुछ ऐसे विद्यार्थी जो पढ़ने की इच्छुक होते हैं वह मुझे ई बुक के रूप में भी निर्मित कर लेते हैं तथा मेरा अध्ययन करते हैं। मेरा अध्ययन लोगों की जिंदगी में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परंतु आने वाले समय में हमारा भविष्य हमें खतरे में प्रतीत होता है।

पथ प्रदर्शक पुस्तक

हम पुस्तकें मनुष्य के जीवन में पथ प्रदर्शक का कार्य करते हैं। हमें पढ़कर ही मनुष्य एक महानायक, गायक, अध्यापक इत्यादि बनता है। जिस मनुष्य ने अपने जीवन काल में हमारा अध्ययन किया होगा  उसके जीवन में मानसिक शांति व शारीरिक कष्टों से काफी हद तक छुटकारा मिलता है। ऐसे मनुष्य जो मुझ में रुचि रखते हैं तथा मेरा गहनता से अध्ययन करते हैं उनके जीवन में हमारे ज्ञान का प्रकाश विद्यमान रहता है। 

सभी उत्तम मनुष्य अपना समय हमारे अध्ययन में बिताते हैं वही मूर्ख वह मनुष्य अपना समय सोकर तथा लड़ाई झगड़े में व्यतीत कर देते हैं। जिसने अपने खाली समय में मेरा अध्ययन किया उसे काफी ज्ञान प्राप्त हुआ जिसकी मदद से अपना भविष्य उज्जवल बना सकता है। हम पुस्तके मानव जीवन में बहुत ही उपयोगी वस्तु है। हमारे बिना किसी भी मानव का कल्याण संभव नहीं है।

पुस्तक का महत्व

किसी भी व्यक्ति के लिए मेरा महत्व समझना बहुत ही आसान है। प्रत्येक व्यक्ति समझता है कि जिस व्यक्ति ने अपने समय को मेरे साथ बिताया मुझे अपना दोस्त बनाया है इसका सुखद परिणाम उस व्यक्ति को प्राप्त हुआ है।

प्राचीन समय में जब ऋषि मुनियों द्वारा अपनी तपस्या से किसी ज्ञान की बातों को अपने लोगों तक पहुंचाना होता तो वह अपने बातों को भोजपत्र पर संग्रहित करते हैं तथा मेरा निर्माण कर उन्हें उचित पाठक तक पहुंचाते थे। पाठक मुझे पढ़ते तथा मुझ से ज्ञान प्राप्त करके तथा उसे अपने जीवन में उतार के महान बनते थे। आज भी बहुत से विद्यार्थी जो मुझे  अपना मित्र मानते हैं तथा मेरे साथ समय व्यतीत करते हैं उन्हें अन्य सभी व्यक्तियों की तुलना में अधिक सम्मानित माना जाता है।  किसी भी क्षेत्र में उनका अपमान नहीं किया जाता। परंतु बड़े दुख की बात है कि सभी लोग मेरा महत्व नहीं समझते हैं और अपना जीवन व्यर्थ के कामों में व्यतीत करते हैं। समय का दुरुपयोग करते हैं तथा जीवन में घट रही घटनाओं के लिए किस्मत को दोष दे देते हैं। परंतु यदि सभी व्यक्ति मेरा अध्ययन करें मेरे साथ समय बिताएं तो उनका जीवन प्रकाशित हो जाएगा।

उपसंहार

मैं हर उस व्यक्ति की मित्र हूं जिस व्यक्ति ने मुझे सम्मानित किया है। वर्तमान समय में भी ऐसे बहुत से विद्यार्थी हैं जो अपना अमूल्य समय मेरे अध्ययन में व्यतीत करते हैं। तथा अपनी कक्षाओं में प्रथम श्रेणी प्राप्त करते हैं तथा शिक्षकों से और सहपाठियों से सम्मान प्राप्त करते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ विद्यार्थी जो मुझे खरीद लेते हैं परंतु पढ़ते नहीं हैं उन्हें कोई लाभ नहीं होता वह ना तो अध्ययन में अच्छे होते हैं ना ही अपनी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर पाते हैं। 

जिससे उनका अस्तित्व नहीं रह पाता। प्राचीन काल से चले आ रहे वेद पुराण ग्रंथ उपन्यास सब मेरे ही रूप है। प्राचीन समय में जब विद्यार्थी गुरुकुल जाते थे तब उन्हें इन्हीं का अध्ययन कराया जाता था । हालांकि आज परिस्थितियां बदल गई हैं विद्यार्थियों के लिए आनलाइन सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुछ विद्यार्थियों ने मुझे ईबुक के रूप में परिवर्तित कर दिया है तथा मेरा अध्ययन करते हैं। e-book मेरा ही नाम है जिसे ऑनलाइन दुनिया में मुझे पढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 

यदि मनुष्य मेरा अध्ययन करें मेरी गहनता को समझे तथा मेरी बातों को अपने जीवन में उतारे तो वह अपनी सफलता की मंजिल आसानी से प्राप्त कर सकता है। विद्यार्थियों को उनके शिक्षकों द्वारा तथा उनके माता-पिता के द्वारा किताबों से स्नेह तथा किताबों के अध्ययन  करने को कहा जाता है। क्योंकि सभी जानते हैं बिना मेरे आज तक कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता है।

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निष्कर्ष

आज का हमारा निबंध पुस्तक की आत्मकथा शीर्षक पर आधारित है। यह शिक्षक परीक्षा में प्रायः विद्यार्थियों से पूछा जाता है। हम आशा करते हैं इस निबंध से आपको मदद मिली होगी। यदि यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।

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