संचारी भाव की संख्या कितनी है ? संचारी भाव के विभिन्न भेद | पूरी जानकारी

संचारी भाव की संख्या कितनी है : हिंदी भाषा को शुरुआत से ही पूजनीय भाषा के रूप में जाना जाता है जहां पर हमें कई प्रकार की विशिष्ट जानकारी प्राप्त होती है। ऐसे में अगर हिंदी व्याकरण की बात की जाए तो हिंदी साहित्य में इसका भी विशेष स्थान माना गया है जहां पर हम विभिन्न प्रकार के रस और उनके भाव के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसे में आज हम आपको संचारी भाव से संबंधित बातें बताने वाले हैं ताकि आप भी हिंदी व्याकरण की इस गरिमा के बारे में जानकारी ले सकें।

रस क्या है?

हिंदी व्याकरण में रस का विशेष महत्व माना गया है जहां पर किसी भी प्रकार की पंक्तियों या वाक्यों को पढ़ने के बाद मन में कुछ भाव जागृत होते हैं जिससे हमारे अंदर विभिन्न प्रकार की अनुभूति प्राप्त होती है जिसे ही रस कहा जाता है। रस के चार मुख्य अंग होते हैं—

1) स्थाई भाव

2) संचारी भाव

3) विभाव

4) अनुभाव

ऐसे में आज हम आपको विशेष रूप से संचारी भाव के बारे में जानकारी देने वाले हैं जिसके बारे में ज्यादा बातें लोगों को पता नहीं होती है।

संचारी भाव क्या है?

हिंदी व्याकरण में संचारी भाव को भी एक विशेष रूप से देखा जाता है जहां पर इसे रस के अंगों के रूप में मान्यता प्राप्त होती है। यह एक ऐसा भाव होता है जो स्थाई भाव को सही तरीके से स्थाईत्व  देने के लिए उत्पन्न किया जाता है। कई बार हमारी बातों में भी संचारी भाव का विशेष उल्लेख होता है। ऐसे में मुख्य रूप से 33 प्रकार के संचारी भाव की संख्या मानी गई है।

ये भी पढ़ें :

डॉक्टर पर निबंध

पुस्तक की आत्मकथा

संचारी भाव के विभिन्न भेद Sanchari Bhav Ki Sankhya Kitni Hai

मुख्य रूप से 33 संचारी भाव माने गए हैं जिनके अंतर्गत निर्वेद, ग्लानि, शंका, मद, श्रम, आलस्य देन्य, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, ब्रिड़ा, चपलता, हर्षा आवेग, जड़ता, गर्व, निषाद, निद्रा, आपस्मार, स्वप्ना, विबोध, अमर, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, वितर्क,औत्सुक्य,अविहित्था,असूया, प्रकृति, बोध आदि आते हैं।

हम आपको संचारी भाव के विशेष गुणों के बारे में जानकारी देने वाले हैं ताकि आपको भी सही जानकारी प्राप्त हो सके।

1). निर्वेद— यह भाव उस समय जागृत होता है जब किसी व्यक्ति को विशेष रूप से अपमान, दरिद्रता जैसे भाव को महसूस करना होता है साथ ही साथ इसके अंतर्गत संसार कि अन्य बातों से उदासीन रवैया दिखाई देने लगता है।

2). शंका — यदि मन में किसी भी प्रकार की हानि का भाव उत्पन्न होने लगे तो ऐसी स्थिति में अचानक की हमारे हृदय से एक अलग भावना उत्पन्न होती है जिसके अंतर्गत हमारे अंदर शारीरिक क्रियाओं का भी परिवर्तन दिखाई देता है।

3). चिंता —- यदि आप किसी वस्तु को प्राप्त करना चाहते हैं और ऐसे में वह प्राप्त नहीं हो पाती है तब चिंता के भाव उत्पन्न होते हैं जिसके अंतर्गत हृदय से दुखी होने का भाव प्रकट होता है।

4). गर्व— कई बार कुछ ऐसी वस्तुएं होती हैं जिसके अंतर्गत हमें गर्व महसूस होता है, जो सुंदरता, ज्ञान, धन या शक्ति के माध्यम से आता है।

5). मोह— कभी-कभी किन्हीं मुख्य चीजों के लिए हमारे मन में अलग प्रकार की भावनाएं उत्पन्न होती हैं जिसके अंतर्गत भ्रम की स्थिति भी होने लगती है जो हमारे अंदर मोह से संबंधित होते हैं।

6). विषाद — जब हमें मनचाही वस्तु प्राप्त नहीं होती और हम असफल होते चले जाते हैं ऐसी स्थिति में यह भाव उत्पन्न होता है।

7). दैन्य — कभी-कभी मन में दुख और दरिद्रता की अवस्था उत्पन्न होती है जिस वजह से यह भाव उत्पन्न होने लगते हैं।

8). मृत्यु— यह भाव उस समय उत्पन्न होता है जब हमें  कष्ट का सामना करना पड़ता है।

9). असूया — जब दूसरों की खुशी को देखकर उन्हें हानि पहुंचाया जाता है, तब यह भाव उत्पन्न होता है जिसमें तिरस्कार और निंदा जैसे भाव भी देखे जाते हैं।

10). आलस्य— कभी-कभी कुछ ऐसे कार्य करें,जब  हमारे अंदर इस भाव की उत्पत्ति होती है तब हमारा मन नहीं लगता है।

11). मद— किसी विशेष प्रकार के मोह के साथ आनंद की प्राप्ति लेना मद के अंतर्गत आता है जहां पर हम स्वार्थवश कार्य करते हैं।

12). उन्माद— जब किसी विशेष कारण से हम खुद को भ्रमित महसूस करते हैं तब हमारे अंदर उन्माद के भाव उत्पन्न होते हैं जहां पर हम विशेष रूप से अपने भाव को परिवर्तित कर सकते हैं।

13). श्रम— जब अत्यधिक कार्य करने की स्थिति में हमारे अंदर थकान उत्पन्न होती है,तब  इस भाव की उत्पत्ति होती है।

14). चपलता— मन में ईर्ष्या और द्वेष के कारण कुछ मुख्य भाव उत्पन्न होते हैं जिसके अंतर्गत कठोर भाव की उत्पत्ति हो सकती है।

15). अपस्मार — जब अत्यधिक मानसिक संताप की स्थिति उत्पन्न होने लगती है जहां पर आपको रहना अच्छा नहीं लगता। तब इस भाव को देखा जाता है।

16). प्रकृति— कई बार अपने भावों को बदलते हुए बात बोला जाता है जिसके अंतर्गत  परिवर्तन महसूस किए जाते हैं तब इस भाव को अपनाया जाता है।

17). भय— जब किसी भी प्रकार की डर की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तब मन में भय के भाव उत्पन्न होते हैं।

18). ग्लानी— लगातार मन में खिन्नता के भाव आने पर ग्लानी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

19). जड़ता— जब मुख्य रूप से विवेक  का भाव उत्पन्न हो और हम किसी भी चीज को एक ही तरह से देखना शुरू करें तब यह भाव उत्पन्न होते हैं।

20). ब्रेडा— जब मन मैं लज्जा और संकोच के भाव आते हैं ऐसी स्थिति में आंखों के माध्यम से बात की जाती है और यह भाव उत्पन्न होता है।

21). हर्ष— जब किसी स्थित वस्तु को प्राप्त करने के लिए विशेष भाव उत्पन्न होते हैं जिसके अंतर्गत मन में खुशी होती है।

22). मती— हर प्रकार की खुशी प्राप्त करने के बाद इसी निश्चय पर पहुंचना मती के अंतर्गत आता है जहां पर भाव उत्पन्न होते हैं।

23). धत्ति— ज्ञान और सत्संग के संपर्क में आने से विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं जो इसके अंतर्गत आते हैं।

24). आवेग— अगर किसी आकस्मिक भय  उत्पन्न होता है तो उत्पन्न भाव को ही आवेग के अंतर्गत देखा जाता है।

25). उत्सुकता— किसी विषय वस्तु की प्राप्ति के लिए रुक नहीं पाना उत्सुकता के अंतर्गत आता है।

26). निद्रा— शारीरिक थकान और मानसिक थकान की वजह से उत्पन्न होने वाले चित्त को निद्रा कहा जाता है।

27). स्वप्ना— सोती हुई अवस्था में व्यक्ति के आचरण की अवस्था ही स्वप्न के अंतर्गत आती है जिसमें कई अनुभव शामिल होते हैं।

28). बौध— ज्ञान प्राप्त करने के बाद विशेष प्रकार की चेतना का प्राप्त करना बोध कहलाता है जहां पर शांति को भी संदेश माना जाता है।

29). व्याधि— योग के द्वारा उत्पन्न हुई मन स्थिति को व्याधि कहा जाता है जिसमें कई प्रकार के भाव देखे जाते हैं।

30). उग्रता— अपमान और  दुर्व्यवहार के कारण निर्दयता के व्यवहार को उग्रता के अंतर्गत देखा जाता है।

31). वितर्क— अनिश्चितता और संदेह के कारण मन में उत्पन्न भाव ही  वितर्क के अंतर्गत आते हैं।

32). स्मृति— किसी भी तरह से वस्तुओं और व्यक्तियों की अनुभूति को स्मृति कहा जाता है जहां पर कई प्रकार के मनोभावों को दर्शाया जाता है।

33). अमष— किसी के अनुचित व्यवहार से उत्पन्न हुई असहनीय भावों को अमष कहा जाता है और इससे भी विभिन्न भाव उत्पन्न होते हैं।

इन सभी का हिंदी व्याकरण में विशेष स्थान बताया गया है जहां पर इन्हें किसी भी तरह से उपयोग करते हुए अपने भावों को व्यक्त किया जाता है साथ ही साथ विशेष रुप से जानकारी प्राप्त की जाती है।

ये भी पढ़ें :-

—————————————-
गुलाब के फूल पर निबंध

Leave a Comment