संथाल विद्रोह का नेता कौन था | पूरी जानकारी हिंदी में पढ़ें

संथाल विद्रोह का नेता कौन था : प्राचीन समय में भारत में कई प्रकार के विद्रोह का सामना किया गया है जिसके दौरान विशेषकर लोगों को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा और कहीं न कहीं इस विद्रोह की वजह से लोगों के बीच में एकजुटता कम दिखाई थी। 

सामान्य तौर पर ऐसा होता था कि जब किसी भी प्रकार का विद्रोह  होता था तो लोगों का समर्थन प्राप्त होता था लेकिन विशेषकर एक समुदाय वर्ग को हानि उठानी पड़ती थी इस वजह से विद्रोह को बीच में ही नहीं छोड़ना पड़ता था। ऐसे में आज हम आपको संथाल विद्रोह के बारे में जानकारी देने वाले है। और विस्तार से बताएँगे Santhal Vidroh के  मुख्य कारणSanthal Vidroh के नेता कौन थेSanthal Vidroh क्या है आदि। 

क्या है संथाल विद्रोह ?

प्राचीन समय में संथाल विद्रोह (Santhal Vidroh) के बारे में लोगों के द्वारा सुना जाता रहा है जिसमें संथाल समुदाय से जुड़े लोगों के द्वारा विद्रोह किया गया था जिसके अंतर्गत मानभूम बड़ाभूम, मिदनापुर, हजारीबाग जैसे क्षेत्रों में संथाल समुदाय के द्वारा विद्रोह किया गया था जिसमें अंग्रेजों ने भी काफी हद तक बर्बरता दर्शाई थी और अंग्रेजों ने इस विद्रोह को भी आगे चलने नहीं दिया था जिसमें कई प्रकार का नुकसान संथाल  समुदाय को झेलना पड़ा था।

संथाल विद्रोह का मुख्य कारण

प्राचीन समय में भूमि पर लगान वसूलने का विशेष रूप से नियम बनाया गया था और यह  विशेष  संथाल समुदाय पर भी लागू किया जा रहा था। ऐसी स्थिति में यह देखा गया कि इस समुदाय के लोग मुख्य रूप से कृषि और प्राकृतिक वन संपदा पर निर्भर थे। लेकिन कुछ ही समय में संथाल समुदाय की जमीन को अंग्रेजों के माध्यम से हड़प लिया गया और जिसके लिए उन्होंने अपना नया ठिकाना पहाड़ियों पर बना लिया था।

उसके बाद उन्होंने उस पहाड़ी जमीन को भी कृषि योग्य बनाया और रहने के लिए घर बनाया था और जिसे  दमनीकोह का नाम दिया था। लेकिन जैसे ही उच्च तबके के लोगों को उनकी इस तरीके से बनाए आशियाने के बारे में पता चला तो वहां पर ही लगान के लिए जमीदारी स्थापित कर दी गई थी और फिर उस जगह पर सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व सबसे ज्यादा बढ़ गया था जिस वजह से भी संथाल समुदाय के लोग लगान के बोझ को सहन नहीं कर पाए थे।

ऐसी स्थिति में जमींदारों और बड़े लोगों ने संथाल समुदाय पर काफी ज्यादा अत्याचार किया है जिस वजह से उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। ऐसे में संथाल समुदाय के लोगों के बारे में किसी ने भी मदद नहीं की और ना ही किसी ने उनके अधिकार  देना जरूरी समझा। ऐसे में तंग आकर संथाल समुदाय के लोगों ने एक विद्रोह किया जिसे  “संथाल विद्रोह” के नाम से जाना जाता है और इन्हीं कारणों को मुख्य रूप से संथाल विद्रोह का कारण माना जाता है।

संथाल विद्रोह का नेता कौन था Santhal Vidroh Ka Neta Kaun Tha

जब समुदाय के लोग बहुत ज्यादा परेशान हो चुके थे ऐसी स्थिति में संथाल विद्रोह के मुख्य नेता मुख्य भूमिका में दिखाई दिए जिन्होंने 1855 ईस्वी में आकर मुख्य रूप से लोगों के बीच में एक नए विद्रोह की शुरुआत की। ऐसे में संथाल विद्रोह के नेता के रूप में सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव का नाम लिया जाता है। 

इस विद्रोह में सिद्धू ने खुद को देवदूत बतला कर संपूर्ण समुदाय के लोगों को अपनी तरफ कर दिया और साथ ही साथ उनमे धर्म की भावना को भी उत्पन्न कर दिया था। ऐसी स्थिति में 1855 की ईसवी को इन चारों भाइयों ने मिलकर एक आम सभा का आयोजन किया जिसमें लगभग 10,000 संथाल समुदाय के लोगों ने अपना सहयोग दिया जिसके अंतर्गत मुख्य रूप से होने वाले अत्याचारों को कम करने की बात की गई और संथालो के इस विद्रोह में काफी नुकसान उठाना पड़ा जिसमें मुख्य नेताओं ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी और इस तरह से संथालो ने अंग्रेजो के शासन को खत्म करने के साथ-साथ अपना  वर्चस्व शुरू करने की मांग रखी थी।

संथाल विद्रोह का विशेष महत्व

इस विद्रोह को संथाल जनजाति का बहुत ही ज्यादा लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ था। संथाल विद्रोह मुख्य रूप से  समुदाय के लोगों को विशेष महत्त्व देने के लिए किया गया था जिसमें समुदाय के लोगों की मांगों को पूरा करना जरूरी माना गया था। ऐसे में इस विद्रोह का विशेष महत्व माना जाता है जिसके मद्देनजर सामान्य लोग भी अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए काबिल हुए और जिन्होंने सही तरीके से आगे बढ़कर इस विद्रोह को आगे बढ़ाया।

संथाल समुदाय का हुआ दमन

जब संथाल समुदाय का विद्रोह अपनी चरम सीमा पर था उस समय अंग्रेजी सेना इस विद्रोह की वजह से परेशान नजर आए जहां विद्रोह को दबाने के लिए कई प्रकार की कार्यवाही की गई थी और साथ ही साथ इस विद्रोह को खत्म करने के लिए घोषणा पत्र भी जारी कर दिया गया था। हालांकि संथाल समुदाय के लोग पीछे हटने वाले नहीं थे और उन्होंने कई जगहों पर जाकर अपने विद्रोह को ज्यादा भड़काने का प्रयास किया था।

इस समुदाय के लोगों के पास अस्त्र शस्त्र की कमी होने की वजह से वे अंग्रेजों के सामने ज्यादा दिन नहीं टिक पाए और इस वजह से कई सारे संथालो को गिरफ्तार कर लिया गया था और जब संथाल नेताओं को गिरफ्तार किया गया तब सामान्य  समुदाय के लोगों का मनोबल गिरने लगा था और फिर फरवरी 1856 को संथाल विद्रोह को खत्म कर दिया गया था।

संथाल विद्रोह से होने वाली हानि

इतिहास गवाह है कि जब-जब भारतवर्ष में किसी प्रकार के विद्रोह की आहट हुई है तब कुछ मुख्य प्रकार की हानियों को देखा गया है जिसके अंतर्गत संथाल विद्रोह भी पीछे नहीं रहा, जहां इसकी वजह से कई लोगों की जानें चली गई। कई ऐसे लोग भी थे जो हमेशा के लिए अपाहिज हो गए थे। इसके अतिरिक्त लोगों के घर टूट चुके थे और उनके रहने की जगह नहीं बची थी।ऐसे  मैं अपने परिवार को सही तरीके से पालन पोषण करना उनके लिए अब मुश्किल हो रहा था।

इस विद्रोह के मुख्य हानियों की वजह से ही कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा और अंत में इस विद्रोह को खत्म करना पड़ा लेकिन तब तक अंग्रेजों की नाक में संथाल विद्रोह ने दम कर रखा था जो इतिहास में दर्ज है।

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