गांधी जी के वे 7 आंदोलन, जिन्‍होंने दिखाया आजादी का रास्‍ता

 

देश को आजाद कराने में महात्मा गांधी का योगदान बेहद जरूरी रहा है। इनके अहिंस आंदोलनों के बिना देश को जल्‍द आजादी मिलना संभाव नहीं हो सकता। आइए जानते हैं महात्मा गांधी के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख योगदान के बारे में ।

महात्मा गांधी को ‘फादर ऑफ नेशन’ कहा जाता है। 2 अक्टूबर 1869 में मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ। गांधी जी के पिता का नाम करमचंद उत्तमचंद गांधी था और वो पोरबंदर के दीवान थे।

 महात्मा गांधी एक बहुत सम्मानित नेता थे और उन्हें शांति और अहिंसा के अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में माना जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को दुनिया भर में उनके विशाल योगदान के लिए काफी प्रशंसा मिली। महात्मा गांधी के जन्मदिवस को ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के एक जाने माने व्यक्ति महात्मा गांधी चाहें भारत हो या दक्षिण अफ्रीका लगभग स्वतंत्रता आंदोलनों में अग्रणी व्यक्ति थे। महात्मा गांधी ने अहिंसा की विचारधारा का पालन किया जिस पर उनके सभी आंदोलन आधारित थे।

गांधी जी, पिछली पीढ़ियों के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए अहिंसा, सहिष्णुता, सच्चाई और सामाजिक कल्याण पर अपने विचारों के लिए, एक सच्ची प्रेरणा रहे हैं। महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के अवसर पर आइए उनके जीवनकाल के दौरान उनके नेतृत्व में हुए कुछ प्रमुख राष्ट्रवादी आंदोलनों में से कुछ पर नजर डालते हैं।

करीब 250 वर्षों तक भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। गोपाल कृष्ण गोखले के अनुरोध पर 1915 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। जिसके बाद इन्‍होंने देशवासियों को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक आंदोलन छेड़ दिया। साउथ अफ्रीका में आजमाए सत्याग्रह का गांधीजी ने यहां भी बखूबी प्रयोग किया। 1857 की महान क्रांति पर काबू पा लेने वाली अंग्रेजी सरकार गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के सामने पस्त नजर आने लगी। इसका कारण था कि कांग्रेस जो पहले सिर्फ एलीट क्लास का संगठन थी, उससे बड़े पैमाने पर आम भारतीय नागरिक जुड़ने लगे।

लोगों को लगने लगा कि कांग्रेस द्वारा चला जा रहा आंदोलन उनके हित में है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी के योगदान (Contribution of Gandhi Ji in the Indian Independence Movement) को शब्दों में नहीं मापा जा सकता है। उनकी नीतियां और एजेंडा अहिंसक थे और उनके शब्द लाखों लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे।

1  चंपारण सत्याग्रह :चंपारण आंदोलन भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन था जो बिहार के चंपारण जिले में महात्मा गांधी की अगुवाई में 1917 को शुरू हुआ था। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने लोगों में जन्में विरोध को सत्याग्रह के माध्यम से लागू करने का पहला प्रयास किया जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आम जनता के अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था

2  असहयोग आंदोलन –महात्मा गांधी तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया गया था। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति प्रदान की। गांधी जी का मानना था कि ब्रिटिश हाथों में एक उचित न्याय मिलना असंभव है इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से राष्ट्र के सहयोग को वापस लेने की योजना बनाई और इस प्रकार असहयोग आंदोलन की शुरुआत की गई।

3 नमक सत्याग्रह- इस आंदोलन को दांड़ी सत्याग्रह भी कहा जाता है। नमक पर ब्रिटिश हुकूमत के एकाधिकार के खिलाफ 12 मार्च 1930 को अहमदाबाद के पास स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिनों का पैदल मार्च निकाला।

4 दलित आंदोलन-1932 में गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की और इसके बाद 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की। ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन करते हुए हरिजन आंदोलन में मदद के लिए 21 दिन का उपवास किया।

5 -भारत छोड़ो आंदोलन-  ब्रिटिश शासन के खिलाफ़यह गांधी जी का तीसरा बड़ा आंदोलन था। 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बंबई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया। हालांकि, इसके तुरंत बाद गिरफ्तार हुए पर युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ के जरिए आंदोलन चलाते रहे।

6  रॉलेट ऐक्ट को विरोध- देश में उठ रही आजादी की आवाज को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा 1919 में रॉलेट ऐक्ट लाया गया। रॉलेट ऐक्ट को काले कानून के नाम से भी जाना जाता है। इस कानून में वायसरॉय को प्रेस को नियंत्रित करने, किसी भी समय किसी भी राजनीतिज्ञ को अरेस्ट करने के साथ ही बिना वांरट किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार देने का प्रावधान था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में इसका विरोध किया गया।

7 खेड़ा आंदोलन –जब गुजरात का एक गाँव खेड़ा बुरी तरह बाढ़ की चपेट में आ गया, तो स्थानीय किसानों ने शासकों से कर माफ करने की अपील की। यहां गांधी ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया जहां किसानों ने करों का भुगतान न करने का संकल्प लिया। उन्होंने ममलतदारों और तलतदारों के सामाजिक बहिष्कार की भी व्यवस्था की। जिसके कारण 1918 में सरकार ने अकाल समाप्त होने तक राजस्व कर के भुगतान की शर्तों में ढील दी।

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