भारत की विदेशी नीति से आप क्या समझते है ?

 

विदेश नीति एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जहां विभिन्न देश विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग प्रकार से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।हर एक देश की सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, अन्य राज्यों से संबंध स्थापित करने व अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कुछ निश्चित उद्देश्य के आधार पर जो नीति निर्धारित करता है, वह उस देश की विदेश नीति कहलाती है।

भारतीय साफ्ट पावर

भारत की विशाल जनसंख्या विदेश नीति को प्रभावित करती है, भारत दुनिया के विशाल बाजार के रुप में जाना जाता है,जिसके कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के साथ अपना संबंध व्यापारिक उद्देश्य के लिए बनाना चाहती हैं|

आर्थिक हित

वर्तमान उदारीकरण के युग में भारत विश्व की 7वीं बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है और भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन बनाने के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनी को आकर्षित किया जा रहा है जिसकी आधारभूत संरचना में अत्यधिक योगदान है। वर्तमान में सरकार द्वारा *मेक इन इंडिया कार्यक्रम, इज आफ डूइंग बिजनेस के जरिए प्रयास जारी है। साथ ही भारत आर0सी0पी0 से अलग होकर अन्य विकल्प अपनाने पर बल दे रहा है।

सांस्कृतिक भुमिका

विदेश नीति के निर्माण में संस्कृति की बड़ी भूमिका होती है, यदपि भारतीय इतिहास में कौटिल्य और अशोक महान की परंपराए विधमान हैं। परंतु विदेश नीती के आरम्भ में अशोक की परंपरा का ज्यादा प्रभाव था। वर्तमान इज़राइल और फिलीपिंस विवाद में भी भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति का ध्यान में रखकर विश्व शांति की स्थापना पर बल दे रहा है।

राजनीतिक भूमिका

दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक देश होने के कारण भारत ने सदैव शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर बल दिया। US, EU, Japan जैसे लोकतांत्रिक देशों के साथ निरंतर मजबूत होते संबंध लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्व को दर्शाते हैं।

शीत युद्धोत्तर काल में भारत की विदेश नीति 

भारत ने शीत युद्धोत्तर काल में उदारीकरण एवं निजीकरण की नीति अपनाया। और एकध्रुवीय विश्व में अमेरिका के साथ बेहतर संबंध बनाने पर बल दिया।परंतु द0 एशिया में उभरते चीन के परिणामस्वरुप और चीन पाकिस्तान के गठजोड़ के कारण अभी भी भारतीय विदेश नीति एवं सुरक्षा के लिए गम्भीर चुनौती विधमान है। भारत ने लुक इस्ट पॉलिसी अपनाया जिससे द0 पूर्व देशों के साथ संबध बेहतर हो सके। दक्षेश को मुक्त व्यापार क्षेत्र के रुप में विकसित करने पर बल दिया है।

भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य

1) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए प्रत्येक संभव प्रयत्न करना।

2) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाए जाने की नीति को प्रोत्साहन देना।

3) सभी राज्य और राष्ट्रों के बीच परस्पर सम्मानपूर्ण संबंध बनाए रखना।

4) अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति और विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक संबंधों में संधियों के पालन के प्रति आस्था बनाए रखना।

5) सैनिक गुटबंदिओं और सैनिक समझौतों से अपने आप को पृथक रखना तथा ऐसे गुटबंदिओं को बढ़ावा  न देना।

6) उपनिवेशवाद का कठोर विरोध करना, चाहे वह किसी भी रूप में हो।

7) सभी प्रकार की साम्राज्यवादी भावना का विरोध करना।

8) उन देशों के जनता की सक्रिय सहायता करना जो उपनिवेशवाद, जातिवाद और साम्राज्यवाद से पीड़ित हों।

किसी भी देश की विदेश नीति एक विशेष आंतरिक एवं बाहरी वातावरण के स्वरूप द्वारा काफी हद तक निर्धारित होती है। इसके अतिरिक्त उसका इतिहास, विरासत, व्यक्तित्व, विचारधाराएं, विभिन्न संरचना आदि का प्रभाव उस पर स्पष्ट रूप से पड़ता है। भारतीय विदेश नीति के प्रमुख लक्ष्यों के निर्धारण एवं सिद्धांतों के प्रतिपादन में भी इन्हीं बहुमुखी तत्वों का योगदान रहा है।

भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता


गुटनिरपेक्षता की नीति

 गुटनिरपेक्षता की नीति भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एवं केंद्र बिंदु है। इसकी घोषणा स्वतंत्रता से पूर्व ही अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रथम रेडियो भाषण के रूप में 7 सितंबर 1946 को ही कर दी थी।

गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने के कारण

1. किसी भी गुट में शामिल होकर अकारण ही भारत विश्व में तनाव की स्थिति पैदा करना उपयुक्त नहीं मानता।

2. भारत अपने विचार प्रकट करने की स्वाधीनता को बनाए रखना चाहता है। उसने किसी गुट विशेष को अपना लिया तो उसे गुट के नेताओं का दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा।

3. भारत अपने आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को और अपनी योजनाओं की सिद्धि के लिए विदेशी सहायता पर बहुत कुछ निर्भर है। गुटनिरपेक्षता की नीति से सोवियत रूस और अमेरिका दोनों से एक ही साथ सहायता मिल पा रही है।

4. भारत की भौगोलिक स्थिति गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने को बाध्य करती है। साम्यवादी देशों से हमारी सीमाएं टकराती हैं। अतः पश्चिमी देशों के साथ गुटबंदी करना विवेक सम्मत नहीं। पश्चिमी देशों से विशाल आर्थिक सहायता मिलती है। अतः साम्यवादी गुट में सम्मिलित होना भी बुद्धिमानी नहीं।

इसका अर्थ है कि भारत वर्तमान विश्व राजनीति के दोनों गुटों में से किसी गुट में भी शामिल नहीं होगा, किंतु गुटों से अलग रहते हुए भी उनसे मैत्री संबंध कायम रखने की चेष्टा करेगा और उनकी बिना शर्त सहायता से अपने विकास में तत्पर रहेगा। इसका उद्देश्य किसी दूसरे गुट का निर्माण करना नहीं वरन् दो विरोधी गुटों के बीच संतुलन का निर्माण करना है।

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